घी


घी का उद्गम भारत में हुआ है तथा अपनी औषधीय गुणवत्ताओं के कारण आज भी इसका उपयोग आयुर्वेदिक औषधियों में व्यापक रूप से किया जाता है।  घी का उपयोग हजारों वर्षों से वस्तुतः सभी रूपों में किया जा रहा है| वास्तव में घी एक "प्राचीन" स्वास्थ्य आहार है, जो स्पष्टत: उन्माद नहीं है।

क्या घी में अत्यधिक वसा नहीं होता है?

साधारणत: यह अवधारणा कि वसा का सेवन आपको मोटा बनाता है, सही नहीं है| हमारे आहार में अच्छी गुणवत्ता के वसा का होना अत्यावश्यक है। साथ ही यह बहुत स्पष्ट है कि मानव शरीर क्रिया विज्ञान के लिए भी वसा अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि हर कोशिका झिल्ली व कोशिकाओं के अंदर के समस्त अंग वसा से बने होते हैं| स्वस्थ पित्ताशय व उसमे स्वस्थ पित्त रस के उत्पादन के लिए वसा आवश्यक होता है| मानव मस्तिष्क में ६०% वसा का समावेश होता है, यहाँ तक कि शारीरिक शुद्धिकरण में भी वसा की आवश्यकता होती है|

घी में मौजूद वसा, ट्रांस-वसा (ट्रांस-फैट), ऑक्सीकृत कोलेस्ट्रॉल या हाइड्रोजनीकृत तेलों से मुक्त होता है। यह विशिष्टता शुद्ध घी में मौजूद वसा को स्वस्थ बनाती है; जो कि शारीर की महत्वपूर्ण क्रियाएं जैसे तंत्रिका (नर्वस), त्वचा व मानसिक स्वस्थ को सबल बनता है, पाचन अम्ल (एसिड) से आपके पेट की अंदरूनी परत की रक्षा करता है व कोशिका झिल्ली (मेम्ब्रेन) को मजबूत बनाता है।

वह क्या है, जो घी को एक उत्तम खाद्य पदार्थ बनाता है?

स्वस्थ वसा से भरपूर व लाजवाब स्वाद के अतिरिक्त,  निम्नलिखित गुण घी को हमारी रसोई व हमारे आहार में अति आवश्यक बनाते हैं:

१. वसा में घुलनशील विटामिन से भरपूर : घी लैक्टोज़-मुक्त होता है तथा मक्खन की तुलना में इसमें वसा (कोलेस्ट्रॉल) की मात्रा कम होती है। यह वसा में घुलनशील विटामिन ए, डी, इ व के से परिपूर्ण है।

क)  इनमें अद्भुत ऑक्सीकरण रोधी गुण होते हैं, व यह हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

ख) विटामिन के२ जो शरीर द्वारा खनिजों( मिनरल्स) जैसे कैल्शियम के उपयोग के लिए आवश्यक है|

ग)  इसमें विटामिन डी का एक अनूठा रूप पाया जाता है जिससे मस्तिष्क के अन्तर्ग्रथन (सिनेप्स) की उचित कार्य पद्धति में सहायता मिलती है, जो मानसिक सतर्कता व स्मृति के लिए फायदेमंद होता है|

२. आंतों के लिए लाभकारी : यह प्राकृतिक रूप में पाये जाने वाले ब्यूटिरेट का समृद्ध स्रोत है। ब्यूटिरेट एक लघु श्रृंखलित वसा अम्ल है, जो एक विषहरण (डीटॉक्सिफायर) कर्मक व सूजन विरोधक (एंटी-इंफ्लेमेटरी) के रूप में काम करता है तथा बृहदान्त्र (कोलन) के स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है। घी ग्रहनी अर्थात क्षोभीय आंत विकार (आई बी एस - इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम), क्रोहन रोग व व्रणीय बृहदांत्र शोथ (अल्सरेटिव कोलाइटिस) से पीड़ित व्यक्तियों के लिए भी अत्यंत लाभकारी है।

३.  सूजन विरोधक : वसा (कोलेस्ट्रॉल) का उत्तम स्रोत होने के कारण ही घी शरीर को सूजन से लड़ने में सहायता प्रदान करता है| वसा (कोलेस्ट्रॉल) सूजन का एक प्राकृतिक उपचार है जो  सूजन कम करने में सहायक है, इसी कारण तनाव व  सूजन की स्थिति के दौरान स्वाभाविक रूप से इसके स्तर में वृद्धि हो जाती है|

४. विषहरण कर्मक : घी शरीर से अशुद्धियों को दूर करता है, इसलिए इसे शरीर साफ करने वाला घटक (बॉडी क्लींजर) भी कहा जाता है| वसा, विशेष रूप से ओमेगा-३ वसा अम्ल (फैटी एसिड) एक प्रबल प्राकृतिक प्रतीउपचायक (एंटीऑक्सिडेंट) हैं जो पेट्रोरसायन (पेट्रोकेमिकल्स), कीटनाशकों और भारी धातुओं का सफाया करने में उपयोगी है। ग्रास-फेड बटर व घी में भी लॉरिक अम्ल (लॉरिक एसिड) होता है जो एक प्रबल रोगाणुरोधक व कवक रोधक (एंटी फंगल) पदार्थ है|

५.  पाचनक्रिया के लिए उत्तम : घी पाचन प्रक्रिया को उत्तेजित करने के लिए जाना जाता है व संभवत: वजन घटाने में भी सहायक है| कैसिइन (दूध में पाए जाने वाला प्रोटीन) व दूध में पाए जाने वाले अन्य ठोस पदार्थों से मुक्त होने के कारण यह दुग्ध उत्पादों के प्रति प्रतिक्रियात्मक लोगों के लिए एक उत्तम विकल्प है।

अतः किसी भी रसोई के लिए घी एक उत्तम घटक है। यह अविकारी है तथा इसकी जीवन अवधि १०० वर्षों तक होती है। साथ ही मक्खन की अपेक्षा इसे प्रशीतन करने की आवश्यकता नहीं होती।

अन्य वसा के अपेक्षाकृत घी का क्वथनांक उच्च होने के कारण यह सरलता से जलता नहीं है, व खाना पकाने के अत्यधिक तापमान को सहन कर सकने में सक्षम है।

आयुर्वेदिक परिप्रेक्ष्य

आमतौर पर, पित्त दोष को संतुलित करने वाले पदार्थ पाचन अग्नि को भी कम करते हैं| परंतु घी पित्त दोष को संतुलित करने के साथ, पाचन शक्ति को भी बढ़ाता है|

यह रसधातु (पचे हुए भोजन का सार), शुक्र धातु (वीर्य) व ओजस के अनुकूल है| घी का तासीर ठंडा होने के कारण, इसका शरीर पर ठंडा मृदु प्रभाव पड़ता है। यह रंग-रूप तथा आवाज़ कि स्पष्टता पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है|

घी की औषधीय महत्ता :

घी अपनी जैव उपलब्धता, शरीर में सुगम प्रवाह की क्षमता व मस्तिष्क के लिए उपयोगिता के कारण कई दवाओं में आधार के रूप में उपयोग किया जाता है|

  • घी आंखों के लिए उत्तम है, भूख में सुधार, आवाज की गुणवत्ता को बनाए रखने, दीर्घायु व ताकत प्रदान करने में सहायता करता है।
  • गाय के घी का उपयोग कामोत्तेजक औषधि (अफ्रोदिसिअक) के रूप में किया जाता है। यह  स्मृति व एकाग्रता में सुधार के लिए भी अत्यंत लाभकारी है।

घी तैयार करने का सही तरीका

 

 ज़्यादातर लोगों का यह मानना है कि यह परिमार्जित मक्खन है, जो दूध से एकत्र की गई मलाई को गर्म करके बनाया जाता है। हालांकि, भारत में पारंपरिक रूप से घी को किण्वन (फेरमेंटशन-कल्चरिंग) की प्रक्रिया से तैयार किया जाता है। किण्वन घी को कम कफा दोष उत्तेजक और सुपाच्य बना देता है।

घी तैयार करने की निम्नलिखित ट्व  विधियां हैं:.

१. दही द्वारा : इस विधि में दूध को उबाल कर ठंडा करने के पश्चात इसे दही जमने के लिए रख दिया जाता है। फिर दही को मथ कर मक्खन निकालते हैं, जिसे गर्म करके घी प्राप्त होता है।

२. मलाई द्वारा :  इस विधि में दूध को उबाल कर  उसे ठंडा करते हैं और तत्पश्चात उससे मलाई अलग कर कई दिनों तक एकत्रित की जाती है। फिर मलाई को मथ कर मक्खन निकाला जाता है तथा इस मक्खन में, घी निकालने से एक दिन पूर्व थोड़ा-सा दही किण्वन प्रक्रिया के लिए मिला दिया जाता है। इस प्रक्रिया के अगले दिन किण्वित मक्खन को गर्म करके घी निकाला जाता है।

 


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