उपवास


विश्राम और उपवास सबसे लाभदायक उपचार हैं - बेंजामिन फ्रेंक्लिन

कारण चाहे स्वस्थ्य संबधी हो या धार्मिक, उपवास दुनिया भर में लोकप्रिय है | उपवास के शारीरिक और मानसिक लाभ चिर काल से बताये जाते रहे हैं | हमारे पूर्वज सूर्यास्त से पहले और सूर्योदय के बाद भोजन ग्रहण करते थे | कुछ अवधि के लिए भोजन या पेय पदार्थ या दोनों के बिना रहना उपवास कहलाता है |

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परन्तु आज-कल के समय में, उपवास का महत्त्व कम हो गया है | लोग स्वास्थय के नाम पर अत्यधिक खाने लगे हैं | यहाँ हम उपवास के परिचय, प्रभाव, कारण, प्रकार, लाभ और इस से संबधित धारणाओँ का अन्वेषण करेंगे |

भोजन ग्रहण करने के पश्चात क्या होता है ?

कार्बोहायड्रेट और प्रोटीन की प्रचुरता वाले खाद्य पदार्थ रक्त में इन्सुलिन का प्रवाह बढ़ाते हैं | इन्सुलिन भोजन को ग्लूकोज़ में तब्दील कर कोशिकाओं तक पहुंचाते है, अथवा यकृत में ग्लाइकोजेन  के रूप में संग्रहित करता है |

उपवास में क्या होता है ?

  • ब्लड शुगर और इन्सुलिन का स्तर उपवास के 6-24 घण्टे के उपरांत गिरने लगता है
  • यकृत ग्लाइकोजन को तोड़ कर ग्लूकोज़ बाने लगता है
  • उपवास शुरू करने के २४ घंटे से लेकर दो दिन के बाद यकृत एमिनो एसिड से नए ग्लूकोज़ का निर्माण करता है जिसे ग्लुकोनियोजेनेसिस कहते हैं |
  • इन्सुलिन का घटा हुआ स्तर वसा को तोड़ कर ऊर्जा प्रदान करता है | इस क्रिया को लाइपोलिसिस कहते हैं | ट्राइग्लीसराइड्स ग्लिसेरॉल और फैटी एसिड्स में तब्दील होते हैं | फैटी एसिड्स शरीर द्वारा ऊर्जा के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं और मस्तिष्क फैटी एसिड्स द्वारा निर्मित कीटोन बॉडीज का इस्तेमाल करता है |
  • उपवास के दौरान शरीर ऊर्जा निर्माण के लिए ग्लूकोज़ के स्थान पर वसा का इस्तेमाल करता है |

 

 

उपवास के लाभ

संवर्धन

  • इन्सुलिन और लेप्टिन की संवेदनशीलता बढ़ती है जिससे जीर्ण रोग जैसे, मधुमेह, ह्रदय रोग या कैंसर होने का खतरा कम हो जाता है |
  • घ्रेलिन (जिसे हंगर हॉर्मोन भी कहते हैं) का स्तर बढ़ता है जिससे आवश्यकता से अधिक खाने की इच्छा कम होती है |
  • वसा रूपांतरण की क्षमता बढ़ती है जिससे संगृहीत वसा का ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए इस्तेमाल होता है |

न्यूनता

  • ट्राइग्लीसेराइड का स्तर घटता है जिससे ह्रदय से सम्बंधित रोगों का खतरा कम होता है |
  • सूजन, जलन और फ्री रेडिकल से होने वाली हानि कम होती है |
  • वज़न बढ़ने की प्रक्रिया और चयापचय सम्बंधित रोग कम होते हैं |

 

उपवास का आयुर्वेदिक दृष्टिकोण

अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान, पर्यावरण और प्रौद्योगिकी पत्रिका के अनुसार, आयुर्वेद यह मानता है कि उपवास से चयापचय सम्बन्धी विषाक्त पदार्थों का आत्मसात्करण होता है | आयुर्वेद में यह भी कहा गया है कि उपवास पाचन अग्नि को बढ़ावा देता है जिससे किसी भी रोग का दुष्प्रभाव कम होता है |

उपवास के प्रकार

उपवास के प्रकार उपवास विशेष के तरीके और नवाचार पर निर्भर करते हैं |

नैदानिक उपवास

यह उपवास इसलिए कठिन हो सकता है क्योंकि लोग इसे स्वेच्छा से नहीं करते हैं | किसी उपचार प्रक्रिया - शल्य चिकित्सा, रक्त जांच - के पूर्व, आपका चिकित्सक उपवास रखने को कह सकता है | बताये गए नवाचार का पालन करना जांच के सही निष्कर्ष और कुशलता के लिए आवश्यक है |

निर्जल उपवास

इस उपवास के दौरान न कुछ खाया जाता है न ही पिया जाता है |

तरल/द्रव उपवास या जल उपवास

तरल उपवास में केवल पेय पदार्थ ग्रहण किये जा सकते हैं | झोर/शोरबा, पानी या पानी में मिला कर बनाये जाने वाले पेय पदार्थ लिए जा सकते हैं | जल उपवास में केवल जल ग्रहण किया सकता है | इन उपवास की अवधि एक दिन या कई दिन भी हो सकती है |

रस उपवास

यह एक प्रकार का तरल उपवास है जो 3-5 दिन तक रखा जाता है | इसका पालन अधिकतर विषहरण या वज़न कम करने के लिए किया जाता है | इसमें ताज़ा, जैविक फल और सब्ज़ियों के रास को पिया जाता है |

आंशिक उपवास

आंशिक उपवास दो प्रकार का होता है | पहला प्रकार लगभग तरल उपवास के जैसा होता है, लेकिन आप कम मात्रा में ठोस आहार ले सकते हैं | दूसरे प्रकार में विस्तारित अवधि तक कुछ प्रकार के आहार, जैसे कार्बोहायड्रेट, मदिरा या लाल मांस नहीं लिए जाते हैं |

सविराम उपवास

इस उपवास के दौरान उपवास और भोजन ग्रहण करने की क्रिया बारी-बारी से पालन की जाती है | इस स्वरुप का पालन एक दिन छोड़ कर, या कई दिन तक किया जा सकता है | इस उपवास की विधि का आप विस्तारित अवधि तक भी पालन कर सकते हैं | उपवास के दौरान ग्रहण किया जाने वाला भोजन अपरिवर्तित रह सकता है, या फिर व्यक्ति कुछ भी खा सकता है | कुछ लोग सारे आहार दोपहर या शाम को एक छोटी अवधि के दौरान ही लेते हैं |

एक दिन छोड़ कर किया जाने वाला उपवास

यह उपवास विधि औरों की अपेक्षा अधिक कठिन होती है | यह विधि मुख्यतः उन लोगों के लिए है जो वज़न घटाने की कोशिश कर रहे हैं | यह उपवास तभी मान्य होता है जब आप कम से कम 24 घंटे उपवास रखते हैं | कुछ लोग इस अवधि को 36  घंटे तक भी बढ़ा देते हैं | इस उपवास के दौरान पानी खूब पियें |

विस्तारित उपवास

इस उपवास में आमतौर पर व्यक्ति ४८ घंटे तक कुछ नहीं खाता है | कुछ लोग इस अवधी को एक हफ्ते तक भी बढ़ा देते हैं | यह उपवास साल में 3-4 बार या महीने में एक बार किया जा सकता है | यह उपवास आम तौर पर वही लोग करते हैं जिनका बॉडी मॉस इंडेक्स अधिक होता है या फिर जिन्होंने अपनी चयापचय प्रक्रिया को इसके लिए तैयार किया होता है | उपवास की अवधि के अनुसार, शरीर में विटामिन और खनिज की मात्रा को संतुलित रखने के लिए आपको जल में कुछ पोषक सप्लीमेंट्स मिलाना पड़ सकता है |

कीटोजेनिक उपवास

यह उपवास शरीर को वसा के तीव्र उपयोग की अवस्था में लाता है | इस अवस्था को कीटोसिस कहते हैं | आहार के मामले में यह उपवास आंशिक उपवास जैसा है | इसमें भी थोड़ा आहार ग्रहण किया जाता है परन्तु आहार का प्रकार भिन्न होता है | कीटोजेनिक उपवास में केवल वसा युक्त भोजन ही ग्रहण किया जाता है |

सविराम उपवास

परिभाषा : भोजन ग्रहण करने की कालावधि के बीच में उपवास के काल | विभिन्न प्रकार के उपवास नवाचार हैं जिसे व्यक्ति अपनी आवश्यकता अनुसार चुन सकता है |

इस उपवास की अवधि 12 घण्टे से लेकर 3 महीने या उससे अधिक की हो सकती है | व्यक्ति हफ्ते में एक बार, या महीने में एक बार या साल में एक बार यह उपवास रख सकता है | कम अवधि का  उपवास आमतौर पर बार-बार किया जाता है; दीर्घकालीन उपवास एक हफ्ते से लेकर एक महीने तक रखा जा सकता है |

सविराम उपवास के प्रकार

12 घंटे का उपवास

  • दिन में तीन बार, सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे के बीच में भोजन ग्रहण करना ; रात को 7 बजे से सुबह 7 बजे तक उपवास रखना |
  • हल्का नाश्ता, दोपहर और रात का भोजन जिसमें कार्बोहाइड्रेट् कम हो, प्रोटीन और वसा की मात्रा संयत हो | परिष्कृत और संसाधित खाद्य पदार्थों से बचें |
  • इससे इन्सुलिन का स्तर कम होता है जिसके स्वरुप शरीर में इन्सुलिन प्रतिरोध नहीं होने पाता है | यह मोटापा रोकने में सहायक है |
  • लेकिन इस उपवास से बढ़ा हुआ वज़न कम नहीं हो सकता |

16 घंटे का उपवास

  • नियमित शाम को 7 बजे से सुबह 11 बजे तक उपवास; बचे हुए 8 घण्टे में भोजन ग्रहण करना |
  • 8 घंटे में 2-3 बार आहार लिया जा सकता है |
  • यह उपवास 12 घण्टे के उपवास से अधिक प्रभावशाली है | यदि कम कार्बोहायड्रेट युक्त भोजन ग्रहण किया जाये तो यह वज़न कम करने में भी सहायक होता है | परन्तु वज़न का घटना काफी धीरे-धीरे होता है |

20 घंटे का उपवास

इस उपवास में केवल शाम को 4 घंटे की अवधि में ही भोजन ग्रहण किया जाता है |

 

 

साधारण उपवास : १२ घंटे

चक्रीय उपवास : १६ घंटे - साप्ताहिक ३क्स

सबल/प्रबल उपवास : दैनिक १६-१८ घंटे

सैनिक उपवास : दैनिक १९-२१ घंटे

एक दिन का उपवास: पूरे २४ घंटे सप्ताह में एक बार

 

 

 

 

 

 

 

उपवास के दौरान क्या करें

  • पानी खूब पिएं - सुबह की शुरुआत 200-250 मिलीलीटर पानी ग्रहण करने से करें
  • व्यस्त रहें - व्यस्त रहने से दिमाग भोजन की तरफ नहीं जाता है
  • चाय/कॉफ़ी पीएं - इससे भूख नहीं लगती है
  • भूख की लहर से निजात पाने के लिए एक ग्लास पानी या एक कप ग्रीन टी धीरे-धीरे पीएं | भूख शांत हो जाएगी |
  • स्वयं को एक महीना दें - शरीर को उपवास का अभ्यास होने में समय लगता है | शुरुआत में यह कठिन लगता है परन्तु धीरे-धीरे नियमितता आ जाती है |
  • पोषक आहार ग्रहण करें - कम मीठा और परिष्कृत कार्बोहायड्रेट आहार ग्रहण करें | आहार में लाभकारी वसा और प्रोटीन की मात्रा संयत हो | इससे शरीर वसा के तीव्र इस्तेमाल की अवस्था में रहता है और उपवास रखना आसान हो जाता है |
  • उपवास ख़त्म होने में आवश्यकता से अधिक न खाएं | भोजन की मात्रा और प्रकार पर नियंत्रण रखें |
  • उपवास को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं - अपने जीवन को उपवास की सारणी के अनुरूप ढालने की अपेक्षा, उपवास की सारणी को अपने जीवन के अनुरूप ढालें | त्यौहार/ शादी/मेहमाननवाज़ी के अवसर पर उपवास न रखें | विराम के पश्चात पुनः उपवास शुरू करें |

उपवास कैसे तोड़ें

उपवास कोमलता से तोड़ें | उपवास की अवधि जितनी अधिक रही हो उतनी ही कोमलता उपवास तोड़ने में अपनाएं | उपवास के तुरंत बाद अत्यधिक आहार ग्रहण करने से पेट में परशानी हो सकती है | निम्नलिखित बातों का पालन करें :

  • उपवास के तुरंत बाद कुछ भी खाने से पूर्व एक गिलास पानी पिएं
  • आहार लेने की शुरुआत फल/सलाद का छोटा हिस्सा, खजूर, अखरोट और बादाम से करें | आप शोरबा/ सूप भी ले सकते हैं|
  • इसके बाद आधे घंटे का विराम दें | इस विराम से भूख की लहर शांत हो जाएगी और आपका पाचन तंत्र पूर्ण भोजन ग्रहण करने के लिए तैयार हो जायेगा |
  • भोजन को अच्छे से चबाएं |
  • खाने में जल्दबाज़ी न करें | हर निवाला स्वाद लेकर खाएं |

उपवास के दौरान आने वाली समस्याएं

भूख

यह उपवास के दौरान एक आम समस्या है | भूख साधारणतः लहरों में आती है और कुछ समय पश्चात शांत हो जाती है | लाभ अवधि तक उपवास रखने से धीरे-धीरे भूख ख़त्म हो जाती है | भूख मिटाने के लिए निम्नलिखित पेय पदार्थ और मसाले लिए जा सकते हैं |

  1. जल - पानी पीते रहने से भूख नहीं लगती है | भोजन ग्रहण करने से पूर्व पानी पीने से भी भूख काम होती है और हम आवश्यकता से अधिक नहीं खाते हैं |
  2. ग्रीन टी - इसमें एंटीऑक्सीडेंट और पोलीफेनोल प्रचुर मात्रा में होता है इसलिए यह काम खाने वाले लोगों के लिए अत्यंत लाभदायक है | इसमें मौजूद शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट चयापचय प्रक्रिया को बलिष्ठ बनाते हैं और वज़न कम करने में सहायक होते हैं |
  3. दालचीनी - दालचीनी पेट के खली करने को धीमा करती है, इसलिए भूख को दबाने में सहायक हो सकती है | इससे ब्लड शुगर कम करने में भी सहायक है इसलिए वज़न कम करने के लिए लाभदायक है | दालचीनी को चाय या कॉफ़ी में मिलाने से स्वाद बढ़ जाता है |
  4. कॉफ़ी - भूख कम करती है |
  5. चिआ के दाने - इनमें गलने योग्य रेशा और ओमेगा-३ फैटी एसिड प्रचुर मात्रा में होते हैं | यह दाने पानी में ३० मिनट तक भीगने पर पानी सोख लेते हैं और एक जेल में परिवर्तित हो जाते हैं जो भूख मिटाने में सहायक है | चिआ के दाने सूखे या फिर जेल रूप में खीर में डाल के खाया जा सकते हैं |

चक्कर आना

उपवास के दौरान शरीर में पानी की कमी से चक्कर आ सकता है | नमक और पानी से इसे रोका जा सकता है | उपवास के दौरान पेय पदार्थ अधिकाधिक मात्रा में लें | यदि आवश्यकता पड़े तो घर में बने सूप मेंया मिनरल पानी में काला नमक मिलाएं | यदि व्यक्ति निम्न रक्तचाप के लिए दवाई ले रहा हो तो यह समस्या भी हो सकती है | चिकित्सक से बात करके दवाई की डोज़ बदली जा सकती है |

सर में दर्द

उपवास के शुरूआती दिनों में यह आम समस्या है क्योंकि उपवास की दिन व्यक्ति कम नमक ग्रहण करता है | सर में दर्द अस्थायी है और समय के साथ ठीक हो जाता है |

कब्ज़

खुराक कम हो जाने से यह समस्या उत्पन्न होती है | यदि रेशा, फल और सब्ज़ियों की मात्रा आम दिनों में अधिक हो तो उपवास के दौरान कब्ज़ को नियंत्रित किया जा सकता है |

सीने में जलन

उपवास के उपरांत सीने में जलन होने से रोकने के लिए भोजन अधिक मात्रा में न खाएं | खाने के तुरंत बाद न सोएं | स्पार्कलिंग पानी में निम्बू निचोड़ कर पीने से राहत मिलती है |

मांसपेशियों में ऐंठन

मधुमेह से ग्रसित लोगों में कम मैग्नीशियम होने से उपवास के दौरान मांसपेशियों में ऐंठन हो सकती है | ऐसे व्यक्ति मैग्नीशियम सप्प्लिमेंट लें |

किस अवस्था में उपवास न करें

  • गंभीर रूप से कुपोषित या अलप भार वाले लोग: जब शरीर में वासा की मात्रा 4% से नीचे गिर जाती है तो शरीर ऊर्जा के लिए प्रोटीन का इस्तेमाल करता है | इससे मांसपेशियों का क्षरण होता है | इस स्थिति को पेशीय दुर्विकास कहते हैं जो किसी भी रूप में हितकारी नहीं है |
  • 18 साल से काम उम्र के बच्चे : बच्चों में उत्कृष्ट विकास हर स्वास्थय संबधी समस्याओं से अधिक आवश्यक है | सही मात्रा में पोषण सही विकास के लिए अनिवार्य है | कम खुराक से विकास अवरुद्ध होगा जो अपरिवर्तनीय है |
  • गर्भावस्था : विकाशसील भ्रूण को विकास हेतु पर्याप्त पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है | पोषण की कमी से इस महत्वपूर्ण अवधि के दौरान भ्रूण को अपरिवर्तनीय हानि पहुँच सकती है |
  • स्तन्यस्रवण : विकासशील बच्चों को सारा पोषण माँ के ढूढ़ से मिलता है | यदि माँ में पोषण की कमी हो तो बच्चों में भी इसकी कमी होगी जिससे उनका विकास अपरिपूर्ण होगा | इसलिए, दीर्घावधि का उपवास नहीं रखना चाहिए |
  • गठिया : यूरिक एसिड की अत्यधिक मात्रा से जोड़ों में सूजन पैदा हो जाती है जिसे गठिया रोग कहते है | उपवास के दौरान यूरिक एसिड शरीर से बाहर कम मात्रा में निकलता है, जिससे यूरिक एसिड की मात्रा शरीर में बढ़ जाती है | इससे गठिया की समस्या गंभीर हो सकती है | उपवास करने से पूर्व चिकित्सक की सलाह लें |
  • जो व्यक्ति एस्प्रिन, मेटफोर्मिन जैसी दवाइयां या फिर आयरन और मैग्नीशियम के सप्प्लिमेंट ले रहे हों, उन्हें चिकित्सक से परामर्श के बाद ही उपवास रखना चाहिए | क्योंकि कुछ दवाइयां खाने के साथ ही ली जा सकती हैं |
  • मधुमेह : टाइप 1 और टाइप 2 मधुमेह से ग्रसित व्यक्ति यदि दवाइयों/इन्सुलिन पर हैं तो चिकित्सक से सलाह लेकर दवाओं के डोज़ में परिवर्तन करना चाहिए | उपवास में ब्लड शुगर का स्तर अत्यधिक काम होने से ह्यपोग्लाइसिमिआ हो सकता है | कांपना, पसीना आना, चिड़चिड़ापन, भूख लगना और उबकाई आना इसके लक्षण हैं | यदि ह्यपोग्लाइसिमिआ का उपचार न किया जाये तो यह जानलेवा हो सकता है |
  • अम्लपित्त (गैस्ट्रोफेगल रिफ्लक्स डिज़ीज़) : इस अवस्था में पेट का एसिड खाने की नली में आ जाता है जिससे खाने की नली के संवेदनशील मांस तंतुओं को हानि पहुँचती है | इसे सीने में जलन होना भी कहते हैं | यह अवस्था उपवास में गंभीर हो सकती है क्योंकि पेट के एसिड को सोखने के लिए पेट में कोई खाद्य पदार्थ नहीं होता है |

 


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